Friday, May 24, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

ऑप्टोरो एक सॉफ्टवेयर को इसका समाधान मानता है. इस सॉफ्टवेयर से खुदरा दुकानदारों और उत्पादकों को बचे हुए माल को आसानी से बेचने में मदद मिलती है.
खुदरा दुकानदारों को एक साथ कई विकल्प मिलते हैं, जैसे- माल को दोबारा बेचने के लिए Blinq नामक वेबसाइट.
वे अपने माल को दान में भी दे सकते हैं, दूसरी दुकानों तक भेज सकते हैं, अमेज़ॉन या ईबे तक पहुंचा सकते हैं.
ऑप्टोरो का अनुमान है कि इसे अपनाकर कूड़े के ढेर में जाने वाले माल को 70 फीसदी तक कम किया जा सकता है.
लेवेलीन कहते हैं, "हमारी तकनीक में कई डेटा स्रोतों का इस्तेमाल करके पता लगाया जाता है कि अलग-अलग आइटम का क्या किया जाए. मिसाल के लिए यदि किसी जूते की नई जोड़ी को केवल बॉक्स से बाहर निकाला गया है और वह एकदम सही हालत में है तो उसे हम सीधे वेबसाइट पर डाल देंगे."
ऑप्टोरो के सह-संस्थापक टोबिन मूर और एडम विटरेलो को यह विचार 11 साल पहले आया था.
उन दिनों वे लोगों के गैराज में पड़े सामान को ईबे पर बेचने में मदद करने के तरीके पर काम कर रहे थे.
लेवेलीन कहते हैं, "कई सारे खुदरा स्टोर के लोग उनके पास आए और कहा कि पिछले सीजन के लौटाए हुए ढेरों जूते उनके पास हैं. उन्हें नहीं मालूम कि उनका क्या करें. क्या वे उनको बेचने में मदद कर सकते हैं."
मूर और विटरेलो को अहसास हुआ कि बड़े खुदरा विक्रेताओं के लिए वे बड़े बाज़ार की तलाश कर सकते हैं. फिर उन्होंने ऑप्टोरो सॉफ्टवेयर बनाना शुरू कर दिया.
नीधम यह देखकर उत्साहित हैं कि बड़े संगठनों ने वापसी में आने वाले माल के कचरा बनने के मुद्दे को पहचान लिया है.
वे नये कपड़ों और जूते-चप्पलों को कूड़े के ढेर में जाने से बचाने के उपाय तलाश रहे हैं. इससे उनके उत्पादन में लगने वाली ऊर्जा और संसाधन को भी सीमित किया जा सकता है.
पर्यावरण के संकटों के बावजूद फ़ास्ट फ़ैशन का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है.
ग्रीनपीस की 2016 की रिपोर्ट
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के मुताबिक साल 2000 से 2014 के बीच कपड़ों का उत्पादन दोगुना हो गया.
एक औसत आदमी हर साल पहले से 60 फीसदी अधिक कपड़े खरीद रहा है.
दुनिया की आबादी साल 2050 तक 9 अरब हो जाने का अनुमान है. ऐसे में वापसी के माल को फिर से उपयोग लायक बनाना बहुत अहम है.
ऑप्टोरो की सीनियर डायरेक्टर एन्न स्टारोडज का कहना है कि उपभोक्ता आदतें अब हानिकारक हो सकती हैं, लेकिन शुरू से आख़िर तक फ़ायदेमंद और पर्यावरण के अनुकूल फ़ैशन मॉडल बनाकर आगे बढ़ा जा सकता है.
वह कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि लोग खरीदारी बंद करने जा रहे हैं, लेकिन कारोबार का ऐसा मॉडल बनाना होगा जिसमें लोगों के लिए टिकाऊ विकल्प चुनना आसान हो."

Thursday, May 9, 2019

اكتشاف آثار للكوكايين في الروبيان بأنهار في بريطانيا

كشفت دراسة علمية أجرها علماء في بريطانيا عن وجود آثار لمادة الكوكايين في الروبيان الذي يعيش في أنهار بمقاطعة سافوك.
وفحص العلماء في جامعة كينغز كوليدج في لندن، بالتعاون مع جامعة سافوك، 15 موقعاً مختلفاً في أنهار سافوك.
وعثر العلماء على مادة الكوكايين في الروبيان، وذلك في جميع العينات التي تم اختبارها، فضلاً عن مواد مخدرة أخرى مثل الكتامين.
ووصف الباحثون النتيجة بأنها "مفاجئة".
وقال البروفيسور نيك بوري، من جامعة سافوك: "هناك حاجة لإجراء مزيد من الأبحاث حول ما إذا كان هذا الكوكايين منتشرا فقط في الروبيان الموجود في سافوك، أم على نطاق أوسع في بريطانيا وخارجها".
وقال الدكتور ليون بارون، من جامعة كينغز كوليدج في لندن: "إن العثور على هذه المواد المخدرة يعتبر أمرا مفاجئا".
وأضاف "نتوقع حدوث ذلك في المدن مثل لندن، لكن ليس في مقاطعات ريفية".
وختم بالقول إن وجود مبيدات حشرية محظورة منذ وقت طويل في بريطانيا في الروبيان يعتبر تحدياً كبيراً، لأن مصادر هذه المبيدات لا تزال غير واضحة.
ربما تكون إضافة السكر لكوب الشاي أمرا معتادا بالنسبة للكثيرين، لكن العلماء يقولون إن الاستمتاع بتناوله لا يتطلب ذلك بالضرورة.
فقد توصلت دراسة بريطانية إلى أن المشاركين فيها تمكنوا من التخلص من السكر، دون أن يؤثر ذلك على استمتاعهم بالشاي، وهو ما يشير إلى أن تغيير سلوك استمر لفترة طويلة أمر ممكن.
وقال العلماء إن التوقف عن تناول السكر دفعة واحدة، أو الحد من تناوله بشكل تدريجي طريقتان فعالتان للحد من استهلاكه.
لكن معدي الدراسة أكدوا أن هناك حاجة إلى دراسة أوسع لتأكيد نتائجهم.
وقام فريق، يضم باحثين من كلية لندن الجامعية وجامعة ليدز، بتحليل بيانات على مدى شهر واحد عن 64 رجلا، اعتادوا تناول الشاي المحلى بالسكر.
وتم تقسيم المشاركين بالتساوي، إلى مجموعة من الرجال توقفوا عن تناول السكر في الشاي مرة واحدة، وآخرون خفضوا السكر تدريجيا على مدى أربعة أسابيع، ومجموعة ثالثة استمرت في تناول الشاي المحلى بالسكر.
وأشارت النتائج إلى أن الأشخاص، الذين خفضوا تناول السكر، كانوا لا يزالون قادرين على الاستمتاع بمذاق الشاي بدون السكر.
وفي نهاية الدراسة، تخلى 42 في المئة من أفراد مجموعة التخفيض التدريجي عن إضافة السكر إلى الشاي، وكذا فعل 36 في المئة من الذين توقفوا عن إضافته مرة واحدة.
واستغنى 6 في المئة من الرجال في المجموعة الثالثة عن السكر أيضا.
وخلص فريق الدراسة إلى أن "تقليل السكر في الشاي لا يؤثر على الرغبة فيه، ما يشير إلى أن تغيير السلوك طويل الأجل أمر ممكن".
وأضاف الباحثون أنه يمكن استخدام طرق مماثلة، للحد من تناول السكر في المشروبات الأخرى.
وتمت مراجعة نتائج الدراسة خلال المؤتمر الأوروبي للسمنة، في مدينة غلاسغو الاسكتلندية