एक साफ़ लेकिन ठहरी हुई सी नहर के बगल
में कुछ खंडहर हैं. ब्रिटिश राज के दौरान ये आलीशान बंगला था जिसमें
सिंचाई विभाग के अफ़सर रुका करते थे.
दशकों से लाल ईंट वाला बंगला
वीरान पड़ा है और इसके पीछे वाले मैदान में अब गांव का बाज़ार लगता है. 20
सितंबर, 2018 के बाद से खंडहर के कई हिस्सों पर दर्जनों गोलियों के निशान
हैं. भीतर एक बड़े कमरे के कोने में खून के दो छोटे धब्बे हैं और ऐसा ही एक धब्बा बगल वाले कमरे में है.
खून के इन धब्बों के करीब पुलिस ने खड़िया से गोला बना दिया है क्योंकि उनके मुताबिक़ ये धब्बे उन दो "बदमाशों के ख़ून के हैं जो यहाँ भागकर छुपे थे और पुलिस एनकाउंटर में मारे गए".
ये अलीगढ़ का हरदुआगंज इलाका है और पुलिस का दावा है कि "पिछले एक महीने में इलाक़े में हुई हत्या की छह वारदातों में जिस गैंग का हाथ है उसमें ये दोनों भी शामिल थे".
अलीगढ़ के एक पत्रकार के पास सुबह साढ़े छह बजे एसएसपी के पीआरओ का फ़ोन आया कि "एक एनकाउंटर चल रहा है".
अगले बीस मिनट बाद जब ये अपने कैमरे के साथ किनारे वाले खंडहर की तरफ़ बढ़े तो 100 मीटर पहले ही इन्हें रोक दिया गया. अगल-बगल कुछ और पत्रकार भी पहुँच चुके थे, वे भी "पुलिस के फ़ोन करने पर" आए थे.
गोलियों की आवाज़ें आ रहीं थीं और दो दर्जन से ज़्यादा हथियारबंद पुलिस वालों ने खंडहर की तरफ़ पोज़ीशन ले रखी थी.
ज़िले के एसएसपी, एसपी समेत सभी आला अधिकारी बुलेटप्रूफ़ जैकटों में तैनात थे और फायरिंग कर रहे थे.
आधे घंटे बाद इस जगह से गाड़ियां निकलीं और बताया गया कि "दो बदमाश और एक पुलिस इन्स्पेक्टर घायल हुए हैं जिन्हे अस्पताल ले जाया जा रहा है".
ज़िले के एसएसपी अजय साहनी ने बीबीसी से कहा कि, "हमारे इन्स्पेक्टर के पैर में गोली लगी थी और दोनों इनामी बदमाश भी घायल हुए थे. उनके पास से पिस्टल-रिवाल्वर और दर्जनों कारतूस भी बरामद हुए. पास में वो मोटरसाइकिल पड़ी थी जिसे इन दोनों ने पिछली रात चुराया था और सुबह छह बजे पुलिस टीम ने जब इन्हें एक नाके पर रोका तब ये भाग कर यहाँ खंडहर में छिप गए थे".
क़रीब दो घंटे बाद घायल युवकों के दम तोड़ने की ख़बर आ गई.
पुलिस का दावा है कि कई चश्मदीद हैं, "जिन्होंने एनकाउंटर के बाद इन दोनों बदमाशों को घायल हालत में अस्पताल ले जाते हुए देखा है".
हालांकि पत्रकारों समेत जितने भी चश्मदीदों से बीबीसी ने बात की, सभी के मुताबिक़, "गाड़ियों में किसे ले जाया गया ये किसी ने नहीं देखा क्योंकि 100 मीटर के भीतर जाने की किसी को इजाज़त नहीं थी".
खंडहर के पास वाली नहर के चौराहे पर एक चाय-नाश्ते की दुकान है और बगल में एक बूढ़ी महिला ठेले पर पान-सिगरेट वगैरह बेचतीं हैं.
सुबह छह बजे तक ये लोग यहाँ पहुँच जाते हैं लेकिन उनका कहना है कि उस दिन इन्हें, "दुकान से थोड़ा पहले ही रोक दिया गया. इलाके में पुलिस की घेराबंदी थी. दो घंटे के बाद सब लोग चले गए और हमने अपना काम शुरू कर दिया".
नाम न लेने की शर्त पर इसी चौराहे पर कम से कम आठ स्थानीय लोगों से हमारी बात हुई.
उन्हीं में से एक ने बताया, "एक दिन पहले कुछ लोग आए थे यह पूछने कि इस खंडहर में कोई चौकीदार वगैरह है क्या?"
दूसरे ने कहा, "हरियाणा नंबरप्लेट वाली एक गाड़ी को हमने यहाँ एक दिन पहले कई चक्कर लगाते देखा था. उसमें कुछ लंबे-चौड़े से लोग थे जो सादे कपड़ों में थे".
एक तीसरे ने कहा, "आपने भीतर जाकर ख़ून के दो छोटे धब्बों को देखा है क्या? किसी भी जवान आदमी को अगर एक भी गोली लगती है न, तो खून का फव्वारा निकल पड़ता है. यहाँ तो दो लोगों को कई गोलियां लगने की बात हो रही है साहब".
पूछे जाने पर अलीगढ़ पुलिस के एसएसपी ने इन सभी बातों को निराधार बताया है और बीबीसी को उन चश्मदीदों के वीडियो दिखाए जिनके मुताबिक़ "एनकाउंटर हुआ था".
ये तीनों वीडियो इस खंडहर के सामने 'फिल्म किए हैं". लेकिन पुलिस ने इन्हें कब और क्यों फ़िल्म किया इस पर अभी बहस जारी है.
बहस इस पर भी जारी है कि जब पत्रकारों तक ने किसी व्यक्ति को पुलिस की गाड़ी में जाते नहीं देखा तो ये चश्मदीद कहाँ थे.
एसएसपी अजय साहनी का तर्क है कि, "एनकाउंटर के समय लोग दूर दूर से, नहर के दूसरी पार से पेड़ों पर चढ़ कर कार्रवाई को देख रहे थे".
जबकि जिन चश्मदीदों से बीबीसी की बात हुई उनका मानना है कि, "पुलिस ने पहले से ही इलाके को कब्ज़े में ले लिया था. अजीब सी बात है कि मोटरसाइकिल पर भागे युवकों ने नहर के किनारे खंडहर में क्यों छुपने की सोची होगी. इसके तीनों तरफ़ खेत हैं और पक्की सड़कें भी. आगे क्यों नहीं बढ़ गए?".
No comments:
Post a Comment